मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, November 13, 2011

जितनी बंटनी थी बंट चुकी ये ज़मीं


जितनी बंटनी थी बंट चुकी ये ज़मीं,
अब तो बस आसमान बाकी है |
सर क़लम होंगे कल यहाँ उनके,
जिनके मुंह में ज़बान बाक़ी है ||
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/11/blog-post_7018.html

8 comments:

JHAROKHA said...

aadarniy sir
bahut hi gahri baat chand panktiyon me.
hardik abhinandan
poonam

रविकर said...

आपकी प्रस्तुति

सोमवारीय चर्चा-मंच पर

charchamanch.blogspot.com

Rajesh Kumari said...

kuch hi shabdon me bahut kuch aane vaale toofan ka sanket.

sushma 'आहुति' said...

behtreen prstuti....

अनुपमा पाठक said...

सटीक बात!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत खूब... वाह!
सादर...

नीरज गोस्वामी said...

shayad Rajesh Reddi ke sher hain ye...behtariin

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
बालदिवस की शुभकामनाएँ!