मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, November 10, 2011

मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा

आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा ,
कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा |
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला ,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा |
-(अज्ञात)

7 comments:

Kunwar Kusumesh said...

वाह,क्या बात है.
वल्लाह आप लग रहे महवे-ख़याल जी.
फोटो तो लाजवाब है अनवर जमाल जी.

नीरज गोस्वामी said...

ये अज्ञात का नहीं बशीर बद्र साहब का शेर है...और ये शेर ही नहीं, पूरी ग़ज़ल बेहद खूबसूरत है

नीरज

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बशीर साहब ने कई मर्तबा मुशायरे में यह पूरी गज़ल पढ़ी है और आपने उन्हें अज्ञात बना दिया!! अफ़सोस!!

Rajesh Kumari said...

bahut khoob jabardast sher.

Atul Shrivastava said...

बेहतरीन।

DR. ANWER JAMAL said...

@ बिहारी ब्लॉगर भाई ! हमें शेर तो ज्ञात था लेकिन शायर अज्ञात था लेकिन आपने अज्ञात का नाम बताकर उन्हें ज्ञात बना दिया !

@@ शुक्रिया नीरज गोस्वामी जी ! आपको पूरी ग़ज़ल पसंद आई है, वैरी गुड।
अगर आपके पास वह ग़ज़ल है तो आप हमें भेज दीजिए , उसे यहां आपकी तरफ़ से पेश कर दिया जाएगा।

DR. ANWER JAMAL said...

@ कुंवर कुसुमेश जी ! आपने भी अवज़ान पर खरा एक बामाना शेर कहकर सच में ही कमाल कर दिया है।
शुक्रिया !
मैं इसे कहीं एचटीएमएल बना कर सहेज लूंगा।