मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, October 16, 2011

"निरंतर" की कलम से.....: शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया

"निरंतर" की कलम से.....: शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया: ज़ख्म खाना रोज़ का काम हो गया भरी दोपहर अन्धेरा छा गया रात दिन में फर्क करना मुश्किल हो गया सहना आदत में शुमार हो गया सब्र अब मर...

2 comments:

प्रेम सरोवर said...

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

mahendra verma said...

सुंदर रचना।