मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, October 4, 2011

फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया


ज़ुबां  से कहूं तो है तौहीन उनकी
वो ख़ुद जानते हैं मैं क्या चाहता हूं
-अफ़ज़ल मंगलौरी

जब से छुआ है तुझको महकने लगा बदन
फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया
-अलीम वाजिद

ये कुछ अशआर हैं जिन्हें गाज़ियाबाद के मुशायरे में पढा गया।
यह मुशायरा २ अक्तूबर के मौके पर 'अदबी संगम' की जानिब से कराया गया।

10 comments:

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन प्रस्तुती....

रविकर said...

शानदार प्रस्तुति |
बहुत-बहुत आभार ||

hem said...

ज़ुबां से कहूं तो है तौहीन उनकी
वो ख़ुद जानते हैं मैं क्या चाहता हूं
-अफ़ज़ल मंगलौरी
बहत खूब अफजल साहब ,
वाकई मोहब्बत की ज़ुबा अल्फाजों की मोहताज नहीं होती !
-झा हेम

प्रेम सरोवर said...

जब से छुआ है तुझको महकने लगा बदन
फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया
-अलीम वाजिद

साधना जी, आपके पोस्ट पर आना बहुत अच्छा लगा । अलीम वाजिद जी को सलां । धन्यवाद ।

अरूण साथी said...

साधुवाद

दिगम्बर नासवा said...

वाह ... लाजवाब शेर हैं ... मज़ा आ आया ..

भारतीय हिन्दी साहित्य मंच said...

बहुत खूब जनाब

मनोज कुमार said...

लाजवाब!

shephali said...

Bhaut hi pyara.....
-- Mere Shabd

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

Achhi Rachna.