मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, September 26, 2011

वो आएंगे तो हड़काएंगे ही

इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि

लिखें हम सही लाख मगर मुसलमां
समझके वो आएंगे तो हड़काएंगे ही

यह हमने मंसूर अली हाशमी साहब की ग़ज़ल पढ़कर कहा है .
उनकी ग़ज़ल यह है .

Blogging at any cost !


लिखना ज़रूरी है !




लिखो कुछ भी; वो पढ़ने आयेंगे ही,

भले दो शब्द ; पर टिप्याएंगे ही.

समझ में उनके आये या न आये,
प्रशंसा करके वो  भर्माएंगे ही. 

जो दे गाली, तो समझो प्यार में है!
कभी इस तरह भी तड़पाएंगे ही.

न जाओ उनकी 'साईट' पर कभी तो,
बिला वजह भी वो घबराएंगे ही.

कभी 'यूँही' जो लिखदी बात कोई ! 
तो धोकर हाथ पीछे पड़जाएंगे ही.

बहुत गहराई है इस 'झील' में तो,
जो उतरे वो तो न 'तर' पाएंगे ही. 

ये बे-मतलब सा क्या तुम हांकते हो!
न समझे है न हम समझाएंगे ही !!

लगा है उनको कुछ एसा ही चस्का,  
कहो कुछ भी वो सुनने आयेंगे ही.
http://mansooralihashmi.blogspot.com/2011/09/blogging-at-any-cost.html?showComment=1317042716126#c4083872711169427504

1 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

समझ में उनके आये या न आये,
प्रशंसा करके वो भर्माएंगे ही.....

--क्या खूब ..यही तो होरहा है...