मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, September 25, 2011

" हो गये उनके हम वो हमारे हुए" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


उनके आने से दिलकश नज़ारे हुए
मिल गई जब नज़र तो इशारे हुए

आँखों-आँखों में बातें सभी हो गईं
हो गये उनके हम वो हमारे हुए

रस्मों-दस्तूर की बेड़ियाँ तोड़कर
अब तो उन्मुक्त पानी के धारे हुए

सारी कलियों को खिलना मयस्सर नहीं
सूख जातीं बहुत मन को मारे हुए

कितने खुदगर्ज़ आये-मिले चल दिये
मतलबी यार सारे के सारे हुए

जो दिलों की हैं धड़कन को पहचानते
बेसहारों के वो ही सहारे हुए

“रूप”-रस का है लोभी जमाना बहुत
चूस मकरन्द भँवरे किनारे हुए

5 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छी गज़ल ...

रस्मों-दस्तूर = रस्मो-दस्तूर होगा ...

DR. ANWER JAMAL said...

Heart beating poem.

वन्दना said...

बहुत सुन्दर गज़ल्।

रविकर said...

बधाई ||
खूबसूरत प्रस्तुति ||

sushma 'आहुति' said...

सुन्दर प्रस्तुती.....