मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, September 24, 2011

एक नज़्म....ड़ा श्याम गुप्त.....

मैंने उस वक्त को इस दिल में सजा रखा है |
तेरी  तस्वीर को  बटुए में  छुपा रखा  है |

मेरे संग है अभी भी तू  इन ज़वाँ यादों में ,
खुद को घिरा रखा है वक्त के हमसायों में |

ख्यालों में अब भी जवाँ धडकनों की बातें हैं,
वक्त  को तेरे लिए बंदी  बना के रखा  है |

वही सूरत बसी है  अब भी  दिले-नादाँ में,
ठहरा है वक्त दिल की हर धडकने-अदा में |

माना कि इक ज़माना हुआ तुमसे जुदा हुए,
मन का आईना है तेरा वही अक्स लिए |

तुम न आये लौट कर, तो आना भी नहीं अब,
ऐसा न हो मन का जवाँ दर्पण चटख जाए |

मेरे महबूब जो तू अब अगर मिल जायगा ,
वक्त मुट्ठी से मेरे शायद फिसल जायगा ||

10 comments:

मनोज कुमार said...

उम्दा पोस्ट।

sushma 'आहुति' said...

मैंने उस वक्त को इस दिल में सजा रखा है |
तेरी तस्वीर को बटुए में छुपा रखा है | बहुत ही सुन्दर....

सागर said...

bhaut hi khubsurat nazam....

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत बढ़िया नज़्म सर |
मेरी नई रचना जरुर देखें-
मेरी कविता: सूखे नैन

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद मनोज जी, सागर , प्रदीप व सुषमा जी...

रविकर said...

प्रस्तुति स्तुतनीय है, भावों को परनाम |
मातु शारदे की कृपा, बनी रहे अविराम ||

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद रविकर...सुंदर दोहा....

नीरज गोस्वामी said...

Badhiya Hai

Neeraj

dr. shama khan said...

इश्क का मिजाज अब रहा कहा एसा ,
दिल तो ऊड़ता पन्छी जेसा
गहराई तो अब सागर मे दीखती हें
खुबसुरती तो अब चाँदनी मे ही रहती हें
...........बहुत खुब लिखा हें ,सर

avanti singh said...

बहुत ही अच्छी रचना ,२ पंक्तियाँ विशेष पसंद आई....

ख्यालों में अब भी जवाँ धडकनों की बातें हैं,
वक्त को तेरे लिए बंदी बना के रखा है |