मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, September 22, 2011

ये इश्क़ जगाता क्यों है ?


पूछा है तो सुनो,
अब सो जाओ
लेकिन थकना मस्ट है पहले
थकने के लिए
चाहो तो जागो
चाहो तो भागो

कौन किसे छोड़ता है
जिसे देखो यहां वो नोचता है
हरेक दूसरे को निचोड़ता है
कोई कोई तो भंभोड़ता है
ख़ुशनसीब है वो जो तन्हा है
कि महफूज़  है मुकम्मल वो

सरे ज़माना आशिक़  मिलते कहां हैं ?
हॉर्मोन में उबाल प्यार तो नहीं
पानी बहा देना प्यार तो नहीं
क़तरा जहां से भी टपके
आख़िर भिगोता क्यों है
ये इश्क़ मुआ जगाता क्यों है ?

ये पंक्तियां डा. मृदुला हर्षवर्धन जी के इस सवाल के जवाब में

9 comments:

रविकर said...

अगर आपकी उत्तम रचना, चर्चा में आ जाए |

शुक्रवार का मंच जीत ले, मानस पर छा जाए ||


तब भी क्या आनन्द बांटने, इधर नहीं आना है ?

छोटी ख़ुशी मनाने आ, जो शीघ्र बड़ी पाना है ||

चर्चा-मंच : 646

http://charchamanch.blogspot.com/

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खुबसूरत....

वन्दना said...

्बहुत सुन्दर रचना।

डा. श्याम गुप्त said...

एक शानदार कविता पर .... बकवास पैरोडी ..

Pradeep said...

"ख़ुशनसीब है वो जो तन्हा है
कि महफूज़ है मुकम्मल वो"
सब दिल को बहलाने वाली बाते है जनाब...घायल की गति घायल ही जानता है ....

अरूण साथी said...

साधु-साधु

सागर said...

bhaut hi sundar....

कुमार राधारमण said...

इसलिए,अपन कभी पड़े नहीं इन चक्करों में। किसी को ख्वाबों में डिस्टर्ब नहीं करते और खुद भी चैन की नींद सोते हैं।

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बढ़िया रचना |
मेरे ब्लॉग में आपका सादर निमंत्रण है |
**मेरी कविता**