मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, September 21, 2011

गीत ..हे मन...ड़ा श्याम गुप्त .....

                       मुशायरे की रफ़्तार  कुछ धीमी होचली है ...पता नहीं क्यों  ! ....खैर ..लीजिए .मैं ही अपनी पेशकश रखता हूँ.........मन की ही तो बात है.... होसकता है कि शायरों- कवियों का मन कुछ पेश करने को नहीं बन पा रहा हो ....इसी मन ...पर पेश है एक गीत ....................

हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||

प्रेम की शिक्षा प्रीति की इच्छा,
तुम्हीं प्रेम  व्यापार |
तुम मानस, उर, चित, जिय, हियरा ,
तुम्हीं स्वप्न संसार |
तुमसे बनें भावना सारी ,
तुम्हीं प्रेम साकार |         
        हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||
रूप  रंग  रस  भाव कार्य सब-
क्रिया-कलाप व्यवहार |
इक दूजे के मन को भाते ,
कर लेते अधिकार |
तन मन परवश होजाता तब-
तुम बन जाते प्यार |      
           हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||
विह्वल भाव होजाते हो मन ,
बन आंसू आधार |
अंतर्मन में बस बन जाते ,
स्वप्नों का संसार |
श्याम का तन-मन स्मृति-वन हो -
उमड़े प्रेम अपार |
             हे  मन ! प्रेम के तुम आधार ||

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

नज़र-नज़र का फेर है!

सागर said...

bhaut hi sundar....

prerna argal said...

आप की पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (१०) के मंच पर शामिल की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप हमेशा ही इतनी मेहनत और लगन से अच्छा अच्छा लिखते रहें /और हिंदी की सेवा करते रहें यही कामना है /आपका ब्लोगर्स मीट वीकली (१०)के मंच पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें /