मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, September 20, 2011

...कृष्ण लीला......ड़ा श्याम गुप्त....

           (   दो  कुण्डलियाँ .)
सोलह हज़ार नारियाँ , परित्यक्ता गुमनाम |
निज रानी सम श्याम ने, उन्हें दिलाया मान |
उन्हें दिलाया मान, नयी जग रीति सजाई |
नहीं किसी की ओर ,कभी पर आँख उठायी |
जग में प्रथम प्रयास यह, नारी का उद्धार |
भ्रमवश कहते रानियाँ , थीं सोलहों  हज़ार ||

रीति निभाई जगत की, जो पटरानी आठ |
अन्य किसी के साथ कब श्याम निभाए ठाठ |
श्याम निभाए ठाठ, कहा जग माया संभ्रम |
जीवन राह में मिलें हज़ारों आकर्षण-भ्रम |
यही श्याम की सीख, योग है यही कृष्ण का |
जल, जल-जीव व पंक मध्य, नर रहे कमल सा ||

2 comments:

रविकर said...

श्याम श्याम की नीतियाँ,
झुकता सादर शीश |

सुन्दर प्रस्तुति

वन्दना said...

यही श्याम की सीख, योग है यही कृष्ण का |
जल, जल-जीव व पंक मध्य, नर रहे कमल सा ||
बिल्कुल सही कहा।