मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, September 13, 2011

दाता तेरे हज़ारों हैं नाम - रज़िया "राज़"





दाता तेरे हज़ारों हैं नाम…(2)
कोई पुकारे तुझे रहीम,
और कोई कहे तुझको राम।दाता(2)
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पेहरा,
तेरा राज़ बड़ा ही गैहरा,
तेरे इशारे होता सवेरा,
तेरे इशारे होती शाम।दाता(2)
ऑंधी में तुं दीप जलाए,
पत्थर से पानी तूं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तू बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।दाता(2)
क़ुदरत के हर-सु में बसा तू,
पत्तों में पौंधों में बसा तू,
नदिया और सागर में बसा तू,,
दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तू,
फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।दाता(2)
ये धरती ये अंबर प्यारे,
चंदा-सूरज और ये तारे,
पतझड़ हो या चाहे बहारें,
दुनिया के सारे ये नज़ारे,
देखूँ मैं ले के तेरा नाम।दाता(2) 
Source :  http://www.thenetpress.com/2009/08/blog-post_08.html

7 comments:

Ehsaas said...

aasaa shabdon me achhi ghazal kahee hai...


http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

मनोज कुमार said...

भावपूरित रचना।

दिगम्बर नासवा said...

सीधी सच्ची रचना ... बस ऐसा करने की जरूरत है ...

डा. श्याम गुप्त said...

क़ुदरत पर है तेरा बसेरा...????????

DR. ANWER JAMAL said...

---यानि आदमी हक़ीक़त को पहचानने वाली नज़र रखता हो तो हरेक क़ुदरती चीज़ में उसे अपने रब का जलवा दिखाई देगा।

sajid said...

Good.........

डा. श्याम गुप्त said...

जलवा दिखाई देना अलग बात है, रब का बसेरा होना अलग बात है...उसने सब बनाया है तो जलवा तो है ही...
--सिर्फ कुदरत पर ही नहीं कण कण में तेरी कारीगरी उसका बसेरा तो ..मानव के मन, भावाकाश पर है..