मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, September 5, 2011

राधाष्टमी पर...ड़ा श्याम गुप्त के दो पद ......


जनम लियो वृषभानु लली ।
आदि -शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली।
जलज-चक्र,रवि तनया विलसति,सुलसति लसति भली ।
पंकज दल सम खिलि-खिलि सोहै, कुसुमित कुञ्ज लली।
पलकन पुट-पट मुंदे 'श्याम' लखि मैया नेह छली ।
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली ।
नित-नित चन्द्रकला सम बाढ़े, कोमल अंग ढली ।
बरसाने की लाड़-लडैती, लाडन -लाड़ पली ।।

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कन्हैया उझकि-उझकि निरखै
स्वर्ण खचित पलना,चित चितवत,केहि विधि प्रिय दरसै
जंह पौढ़ी वृषभानु लली , प्रभु दरसन कौं तरसै
पलक -पाँवरे मुंदे सखी के , नैन -कमल थरकैं
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों ,फर फर फर फरकै
तीन लोक दरसन को तरसे, सो दरसन तरसै
ये तो नैना बंद किये क्यों , कान्हा बैननि परखै
अचरज एक भयो ताही छिन , बरसानौ सरसै
खोली दिए दृग , भानु-लली , मिलि नैन -नैन हरसें
दृष्टि हीन माया ,लखि दृष्टा , दृष्टि खोलि निरखै
बिनु दृष्टा के दर्श ' श्याम' कब जगत दीठि बरसै

7 comments:

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति ||

बधाई ||

वन्दना said...

बहुत सुन्दर्।

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद रविकर व वन्दना जी.....राधे...राधे...

दिगम्बर नासवा said...

राधा के सुन्दर प्रसंगों को ले कर लिखा गया मधुर काव्य ....

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद दिगंबर जी .......राधा-कृष्ण के काव्य में कुछ भी लिखा जाय वह तो मधुरामृत ही होता है.....आभार...

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा लगा इन्हें पढ़ना।

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद मनोज जी....राधे ...राधे...