मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, September 2, 2011

त्रिपदा अगीत......ड़ा श्याम गुप्त.....

चाहत थी हम कहें बहुत कुछ ,
तुम हर लम्हा रहे लजाते;
हम  कसमसाते ही रह गए |

आगये खाली हाथ दर पे ,
पूछा क्या लाये तो बोले;
दिल दूसरा कहाँ से लाएं |

कहके  वफ़ा करेंगे सदा ,
वो  जफा करने लगे यारो;
ये कैसा सिला है बहारो  |

बात क्या बागे-बहारों की,
बात न हो चाँद सितारों की;
बात बस तेरे इशारों की |

प्रीति प्यार में नया नहीं कुछ ,
वही पुराना किस्सा यारो;
लगता शाश्वत नया नया सा ||

4 comments:

शालिनी कौशिक said...

bahut sundar
फांसी और वैधानिक स्थिति

रविकर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
आपको बहुत-बहुत --
बधाई ||

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

त्रिपदा अगीत क्या होता है?

Dr. shyam gupta said...

----अगीत ...हिन्दी कविता में निराला जी के अतुकांत-गीत की अगली कड़ी की एक विधा है ...उसके विभिन्न छंदों(षट्पदी अगीत, लयबद्ध अगीत,नव-अगीत आदि..) की कड़ी में एक छंद है... त्रिपदा अगीत ...जिसमें १६-१६ मात्राओं की तीन पंक्तियाँ होती हैं ..जिनमें अन्त्यानुप्रास आवश्यक नहीं, तुकांत या अतुकांत, दोनों हो सकते हैं , लयबद्धता व गतिमयता होनी चाहिए...

---उदाहरणार्थ उपरोक्त... ट्राई करिये...