मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, August 5, 2011

क्यूं बार-बार दरकते है रिश्ते ? Rishte

 क्यूं बार-बार दरकते है रिश्ते, 
अपने को अपने में ढूंढ़ते है रिश्ते.
खून भी वही है, रंग भी वही,
दर्द भी वही है,अहसास भी वही
फिर क्यु जहर में घुलते हैं रिश्ते .
ज़मीं भी वही है , फ़िज़ा  भी वही
गुल भी वही,गुले बहार भी वही
फिर क्यूं  दर-दर भटकते है रिश्ते
गर मोहब्बत हुई होती कम ,तो बात और थी,
यहाँ तो सियासत ने बदल दिए है रिश्ते
अब तो बार-बार आँखों से ढलकते है रिश्ते,
विश्वास को मार भय में जीते हैं रिश्ते. 
-------------
ये पंक्तियां हमें डा. शमा ख़ान ने हमारे एक लेख पर टिप्पणी के तौर पर भेंट की हैं।
हमें ये पसंद आई हैं और उम्मीद है कि आपको भी पसंद आएंगीं।

6 comments:

वन्दना said...

बिल्कुल पसन्द आयी………रिश्तो का सही आकलन किया है।

नीरज गोस्वामी said...

इस क्यूँ का जवाब किसके पास है ????? काश किसी के पास तो होता...

नीरज

Kunwar Kusumesh said...

रिश्तों में उपजती खटास पर अच्छी लगी शमा जी की कविता.
शमा जी की कविता पढ़ रहा था तो किसी का एक बहुत प्यारा और मौजूं शेर याद आ गया,सुनियेगा:-
करवटें लीं मेरे हालात ने जैसे जैसे.
दोस्त भी अपने बदलते गए वैसे वैसे.
अगर हम अपना ego त्याग दें तो इस मुसीबत से बचा जा सकता है.न त्याग सकें तो कम से कम ego पर नियंत्रण रखने की कोशिश तो करें.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत उम्दा!

शालिनी कौशिक said...

गर मोहब्बत हुई होती कम ,तो बात और थी,
यहाँ तो सियासत ने बदल दिए है रिश्ते
सही कहा शमा जी ने. सुन्दर प्रस्तुति डॉ.साहब धन्यवाद्

Rachana said...

अब तो बार-बार आँखों से ढलकते है रिश्ते,
विश्वास को मार भय में जीते हैं रिश्ते.
rishte bahut sunder likha hai shama ji ko badhai
rachana