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Saturday, August 6, 2011

जौनपुर का पुल (नज़्म) Jaunpur Ka Pul

जौनपुर का पुल

एक हिंदू एक मुस्लिम यानि दो राजों का राज
अहले इल्मो-फ़ज़्ल का था जमघटा
हुक्म चलता था यहां शाहाने शरक़ी का कभी
फिर हुकूमत हो गई शाही मुग़ल सुल्तान की
दानिशो-हिकमत का यहां था ग़लग़ला
खि़त्ता ए यूनान इसको जानिए
देखिए मस्जिद अटाला और कहिए वाह वाह
सरवरों की सरवरी पहचानिए
शायरों की शायरी है आज भी
दूसरों से कम नहीं थी कम नहीं है आज भी
आते आते हुक्मरानी आई आलमगीर की
जिसको औरंगज़ेब भी कहते हैं लोग
आदिलो-मुन्सिफ़ था ग़ाज़ी उसको रिआया थी अज़ीज़
हां जौनपुरी रिआया यूं परेशां हाल थी
जो नदी गुज़री हुई है शहर से
धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते थी वबाले जान भी
बेबसी बेचारगी में मुब्तला थी ज़िंदगी
रफ़्ता रफ़्ता बात पहुंची हज़रत ए सुल्तान तक
शाह के इंजीनियर थे हुक्म की तामील में
रोज़ो शब कोशां रहे हर वक्त सरगरदां रहे
हुक्म मामूली न था फ़रमाने औरंगज़ेब था
ऐसा पुल तामीर हो जिसकी न हो कोई मिसाल
नाम रौशन हो हर इक मज़्दूर का
ईंट गारे और पत्थर की हक़ीक़त कुछ नहीं
दिल अगर कारीगरों का मुख़लिसो बेबाक हो
है वही पुल जो बना था तीन सदियों पेशतर
किस मसाले से बनाया पत्थरों को जोड़कर
आज तक कोई समझ पाया नहीं
कीमियागर सर पटकते रह गए
थे वही सब संगो खि़श्त लेकिन जौनपुरी दिमाग़ ?
और शाही परवरिश के साथ वो नामो नुमूद
आज तक पैदा न कर पाया कोई भी नामवर
एक भी पत्थर निकल जाए अगर
जोड़ने वाला कोई पैदा नहीं
शहर के कारीगरों को कीजिए झुक कर सलाम
काम से रौशन हुआ करता है नाम

शायर
अनीस मुनीरी , एम. ए.
दीवान - रम ए आहू
पृष्ठ सं. 136-138
किताब मिलने का पता
मदरसा क़ासिम उल उलूम
अंसार नगर, रखियाल रोड
अहमदाबाद 23
अटाला  मस्जिद का दरवाज़ा 


शब्दार्थ
इल्मो फ़ज़्ल-ज्ञान और श्रेष्ठता , शाहाने शरक़ी-शरक़ी बादशाह
दानिशो हिकमत-तत्वदर्शिता और दर्शन , ग़लग़ला-दबदबा
खि़त्ता ए यूनान-यूनान का इलाक़ा (यूनान ज्ञान, विज्ञान, कला और दर्शन में बहुत मशहूर था, इसीलिए उसकी मिसाल दी गई है)
सरवरों की सरवरी-बादशाहों की बादशाही,
आदिलो मुन्सिफ़-न्यायप्रिय, ग़ाज़ी-युद्ध में विजेता,रिआया-प्रजा,
अज़ीज़-प्यारी, रफ़्ता रफ़्ता-धीरे धीरे, हज़रत ए सुल्तान-बादशाह
हुक्म की तामील-आदेश का पालन, रोज़ो शब-दिन रात, कोशां-कोशिश में लगे होना, सरगरदां-चिंतामग्न, मुख़लिस-सत्यनिष्ठ, बेबाक-साफ़ बात कहने वाला
पेशतर-पहले, कीमियागर-केमिस्ट्री के विशेषज्ञ, संगो खि़श्त-पत्थर और मिट्टी
अटाला मस्जिद का अंदरूनी मंज़र

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

नज़्म के साथ चित्र भी बहुत खूबसूरत हैं!

एस.एम.मासूम said...

वाह जौनपुर पे नज़म क्या बात है. नज़्म बेहतरीन है हाँ इतिहासकारों कि नज़र से शाही पुल का औरंगजेब से कुछ लेना देना नहीं था.

DR. ANWER JAMAL said...

नज़्म कहने वाले शायर ने जौनपुर के पुल की तामीर का ताल्लुक़ बादशाह औरंगज़ेब से जोड़ा है तो उनके पास कुछ न कुछ दलील भी ज़रूर होगी। इसके लिए उनसे दिए गए पते पर ख़त के ज़रिये मालूमात की जा सकती है। आम तौर पर ऐसा होता है कि बड़े प्रोजेक्ट शुरू तो कोई करता है और वे ख़त्म किसी और बादशाह के दौर में होते हैं। इस तरह कोई उस तामीर का ताल्लुक़ उस प्रोजेक्ट शुरू करने वाले बादशाह से जोड़ता है तो कोई उस बादशाह से जोड़ देता है जिसके ज़रिये वह काम मुकम्मल होता है।
बहरहाल यह गुफ़्तगू का सब्जेक्ट है लेकिन जौनपुर का पुल बेनज़ीर है और यह नज़्म भी जो कि उसकी तारीफ़ में लिखी गई है।
आपको यह नज़्म पसंद आई है।
इसके लिए आपका शुक्रिया !

डा. श्याम गुप्त said...

जौनपुर पौराणिक काल की नगरी है जो जमदग्नि ऋषि ( परशुराम के पिता ) की तपोस्थली थी व काशी-कौशल राज्य के अंतर्गत थी...