मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, August 4, 2011

मैं सुन रहा हूं चीत्कार चिताओं का The Burning Soul


सभ्यता के श्मशान में
हड्डियों के ढेर पर
मांस की चादर में
बेरंग आत्मा
जब सुलगती है तो
चीत्कार ज़रूरी है
लेकिन इसे सुनता वही है
जो ख़ुद सुलग रहा हो
हां,
मैं सुन रहा हूं चीत्कार
चिताओं का, चिंताओं का
अबलाओं का, मांओं का
करूण क्रंदन
हर घड़ी हर पल
क्योंकि वह प्रतिध्वनि है
मेरे ही अंतर्मन की

आज वंदना जी के ब्लॉग पर गए और उनकी रचना पढ़ी 
‘कभी देखा है चिता को चीत्कार करते हुए ?‘
तब हमने तुरंत ही उपरोक्त रचना के माध्यम से उन्हें जवाब दे दिया।
आपको हमारा जवाब कैसा लगा ?
बताइयेगा ज़रूर !!!

8 comments:

वन्दना said...

यथार्थ को प्रतिबिम्बित करता आपका जवाब सच मे काबिल-ए-तारीफ़ है।

DR. ANWER JAMAL said...

आपकी तारीफ़ इस रचना के लिए ख़ास मायने रखती है.

आपका शुक्रिया .

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही गहन सत्य की अभिवयक्ति...

डा. श्याम गुप्त said...

मैं सुन रहा हूं चीत्कार
चिताओं का, चिंताओं का
अबलाओं का, मांओं का
करूण क्रंदन
हर घड़ी हर पल
क्योंकि वह प्रतिध्वनि है
मेरे ही अंतर्मन की---
---क्या इसका अर्थ यह नहीं निकलता कि ये सारे क्रिया-कलाप मैं ही कर रहा हूँ ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सही लिखा है ..यह चीत्कार वही सुन सकता है जो खुद सुलग रहा हो

Dorothy said...

लेकिन इसे सुनता वही है
जो ख़ुद सुलग रहा हो

सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

Anjana (Gudia) said...

लेकिन इसे सुनता वही है
जो ख़ुद सुलग रहा हो…

sach hai!

शालिनी कौशिक said...

जब सुलगती है तो
चीत्कार ज़रूरी है
लेकिन इसे सुनता वही है
जो ख़ुद सुलग रहा हो
हां,
मैं सुन रहा हूं चीत्कार
चिताओं का, चिंताओं का

बहुत सही अभिव्यक्त किया है आपने एक करुण ह्रदय की व्यथा को और ये भी की एक करुण ह्रदय ही ये सब सुन सकता है वर्ना पत्थरों इस संसार में कौन सुनता है जीते जागतों की व्यथा भी