मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, August 14, 2011

!!!मैं इतनी लालची भी नही!!!

तुम एक बार कहो तो सही,
मैं इस दुनिया का,
सब कुछ छोड़ सकती हु,
तुम्हारे लिए,
ये कपडे ये गहने,
ये झुमके ये कंगन,
ये आराम भरा जीवन,
ये दौलत ये शोहरत,
ये बनी बनाई किस्मत,
ये खाना ये पानी,ये सब रंग जबानी,
ये घुमना ये फिरना 
ये सजना सबरना,
ये खुशिया मानना,
ये यू मुस्कुराना,
ये सांसे ये धड़कन,
ये जीवन का पल पल,
ये पाने की तमन्ना,
ये खोने का भय,
सब छोड़ दू मैं,
पर एक बात कहू...?तुम सच में मुझे,
लालची तो न समझोगे न...?
आखिर कर,
मैं हु तो एक औरत ही ना
सब कुछ छोड़ने के बाबजूद भी,
बस तुम्हे पाने का,
तुम्हारे साथ रहने का,और तुम्हारे साथ जीने का 
जो लोभ है,जो मोह है, 
 लाख कोशिशो के बाबजूद भी,
वो मुझसे जाने क्योँ,
 छुटता ही नही.......................................................!!


Source : http://www.facebook.com/notes/arti-jha/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%9A%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80/169418036459783

10 comments:

शिखा कौशिक said...

too good Aarti ji .best of luck .

शालिनी कौशिक said...

अक nari ke मन को बहुत hi bhavpoorn shabdon me pragat kiya है.badhai

सागर said...

bhaut hi khubsurat....

दिगम्बर नासवा said...

यही तो प्रेम है ...

डा. श्याम गुप्त said...

आरती जी...बहुत सुंदर अतुकांत कविता है ...

artijha said...

aap logo ne jo meri kabita ko pasand kia hai main uske lie tahe dil se aapki sukar gujar hu....mujhe to pata bhi nhi tha ki meri rachana ko yaha bhi post kia gaya hai..bahut bahut dhanybad....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
स्वतन्त्रता की 65वीं वर्षगाँठ पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

डा. श्याम गुप्त said...

छिद्रान्वेषण ----मुझे लगा यह ६४ वीं वर्ष गाँठ है....?

DR. ANWER JAMAL said...

नारी के लिए किस चीज़ की अहमियत कितनी है ?
यही इस रचना में बड़ी सादगी से बताई गई है।

Mayank Mishra said...

सब छोड़ दू मैं,
पर एक बात कहू...?तुम सच में मुझे,
लालची तो न समझोगे न...?

कविता की एक-एक पंक्ति पढ़ता जा रहा था, इन पंक्तियों ने सहसा ही लय धीमी कर दी, संजीदा कर दिया।

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति।