मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, August 12, 2011

दो मुट्ठी मिट्टी मेरी कब्र पर डाल देना ,जो मुझे ना मिल सका मेरी लाश को दे देना

इंतज़ार तुम्हारा

ज़िन्दगी भर किया

रातों को जागता रहा

निरंतर

अश्क बहाता रहा

इज़हार-ऐ-मोहब्बत का

जवाब ना मिला

मेरे हसरतों का खून

हो गया

अब आखिरी इल्तजा

सुन लो मेरी

मरने के बाद

सुकून के खातिर

दो मुट्ठी मिट्टी मेरी

कब्र पर डाल देना

जो मुझे ना मिल सका

मेरी लाश को दे देना

अपनी बेरुखी पर पर्दा

डाल देना

12-08-2011

1347-69-08-11

3 comments:

शालिनी कौशिक said...

बहुत भावपूर्ण .सुन्दर प्रस्तुति. बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुति है!
रक्षाबन्धन के पुनीत पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

dr. shama khan said...

very nice....berookhi per metti dal dena...very tuching...