मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, August 11, 2011

रिश्ते और फिज़ा -डॉ. शमा खान



रिश्ते और फिज़ा बरबस बांधने का गुर रखते हैं,
बिखर जाएँ तो हर निशान मिटने का दंभ भरते हैं

न हो टकराहट,आहत भी कोई न करे
तो खुद भी फलें ,फलने तुम्हें भी दें

रिश्ते औ फिजा तो मन की डोर से बंधे हैं
जेहन के दाव पेंच कहाँ ये समझते हैं

मैं 'मैं' हूँ जताने में जहन तो सब तबाह करती है
दिल टूटते हैं,तो दरारें जमी पर पड़ती हैं
कहीं आँखों से तो कहीं समुन्द्र से लहरें उठती हैं

रुदन फूट पड़ता है,जब गम हद से गुज़रता है
ज़लज़ला-ए-सुनामी का रूप भी धरता है
टूट जाते हैं सपने चाँद पर बसने के
धरती का घरोंदा भी कहाँ बच पता है

रह जाती हैं बस अतीत की मधुर स्मृतियाँ
पाने और खोने की भूल भुलैय्या में

झूलती सी ,ठिठकी सी मनु अपने से पूछती है,
प्रेम ही तो न हुआ,अपनों से.......,फिजा से.....,रिश्तों से

डॉ. शमा खान

4 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर रचना....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना!

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

रुदन फूट पड़ता है,जब गम हद से गुज़रता है
ज़लज़ला-ए-सुनामी का रूप भी धरता है
टूट जाते हैं सपने चाँद पर बसने के
धरती का घरोंदा भी कहाँ बच पता है

bahut achhaa likhaa hai aapne
aameen

शालिनी कौशिक said...

रुदन फूट पड़ता है,जब गम हद से गुज़रता है
ज़लज़ला-ए-सुनामी का रूप भी धरता है
टूट जाते हैं सपने चाँद पर बसने के
धरती का घरोंदा भी कहाँ बच पता है
सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति. बधाई.