मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, August 30, 2011

-कौन है वो...ड़ा श्याम गुप्त....

 कौन है वो  जो हरेक पल की आरज़ू बनकर |
 दिल के इन बंद दरीचों में समाये जाता |

किस के दामन की हवा का ये महकता झोंका ,
गमे-दरिया को भी इस दिल के बहाए जाता |

किसने यह छेड़ दिया राग बसन्ती आकर ,
झूमने गाने लगा दिल था जो गम से बोझिल |

किसकी वीणा की मधुर तान ने सरगम छेड़ी,
याद आने लगे  तन्हाई  में,  बीते  वो   पल |

हो चला झंकृत तन-मन का ये कोना कोना ,
बस गया कौन है ये नाद-अनाहत बनकर |

ये फिजाँ झूम के मचली तो हम ये जान गए,
तू ही इस राह से गुजरा है जुस्तजू बनकर  ||

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बिना मतले की ग़ज़ल!

Kunwar Kusumesh said...

जैसे ही आसमान पे देखा हिलाले-ईद.
दुनिया ख़ुशी से झूम उठी है,मनाले ईद.
ईद मुबारक

डा. श्याम गुप्त said...
This comment has been removed by the author.
रविकर said...

बहुत सुन्दर --
प्रस्तुति |
ईद की बहुत बहुत मुबारकबाद ||
बधाई ||

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद रविकर जी व कुशुमेश जी...

---शास्त्रीजी ..गज़ल व नज़्म में अंतर तो समझिए... यह गज़ल नहीं है ...

Dr Varsha Singh said...

ये फिजाँ झूम के मचली तो हम ये जान गए,
तू ही इस राह से गुजरा है जुस्तजू बनकर ||

वाह...वाह...वाह...

शालिनी कौशिक said...

ये फिजाँ झूम के मचली तो हम ये जान गए,
तू ही इस राह से गुजरा है जुस्तजू बनकर |
bahut sundar bhavabhivyakti .badhai

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शालिनी जी व वर्षा जी ..आभार....पेश है..


"इस राह से तू गुजरा होगा ज़रूर,
तेरे क़दमों के निशाँ निहारते चले गए|..."