मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, August 28, 2011

सच्चे मददगार

आंसू ही उमरे-रफ्ता के होते हैं मददगार,
न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.

मिलने पर मसर्रत भले दुःख याद न आये,
आते हैं नयनों से निकल जरखेज़ मददगार.

बादल ग़मों के छाते हैं इन्सान के मुख पर ,
आकर करें मादूम उन्हें ये निगराँ मददगार.

अपनों का साथ देने को आरास्ता हर पल,
ले आते आलमे-फरेफ्तगी ये मददगार.

आंसू की एहसानमंद है तबसे ''शालिनी''
जब से हैं मय्यसर उसे कमज़र्फ मददगार.


कुछ शब्द-अर्थ:
उमरे-रफ्ता--गुज़रती हुई जिंदगी,
जरखेज़-कीमती,
मादूम-नष्ट-समाप्त,
आलमे-फरेफ्तगी--दीवानगी का आलम.

शालिनी कौशिक


14 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

अच्छी ग़जल है तो उम्दा ही कहूँगा।

Kunwar Kusumesh said...

बढ़ियाँ शब्द संयोजन.

DR. ANWER JAMAL said...

आज तो आपने हमें हैरत में डाल दिया है।
एक जगह आपसे शायद जल्दी में ‘बादल‘ के बजाय बदल लिख दिया गया है।

कैसे ईमानदार हैं हमारे प्रधानमंत्री जी ?

Sawai Singh Rajpurohit said...

शालिनी कौशिकजी
आभार

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ...
इस फन में ही माहिर हैं आप पता न था ...
लाजवाब उम्दा गज़ल है ...

वन्दना said...

शानदार गज़ल्।

रविकर said...

बहुत सुन्दर
बधाई ||

शिखा कौशिक said...

very true .tears are real companion .you have explained very beautifully .congratulation .

शालिनी कौशिक said...

aap sabhi ka mera utsah vardhan karne hetu dhanyawad.
@dr.sahab hairat kaisee sab aapne hi madad kee hai .badal shabd me sudhar kar diya hai.

somali said...

बहुत सुन्दर

सागर said...

khubsurat shabd aur ehsaaso se saji rachna...

नीरज गोस्वामी said...

SUBHAN ALLAH...BEHTARIIN...DAAD KABOOL KAREN.

शालिनी कौशिक said...

somali ji,sagar ji aur neeraj ji aabhar.

किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है said...

bahut accha
aapki rachna prabhavit karti hai, mera naman swikaar karen.

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