मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, August 14, 2011

तू वही है...गज़ल...ड़ा श्याम गुप्त ....

 तू वही है |
तू वही है |

प्रश्न गहरा ,
तू कहीं है?

कौन कहता,
तू नहीं है |

जहां ढूंढो,
तू वहीं है |

है भी तू, 
है भी नहीं है |

तू कहीं है,
या नहीं है |

श्याम 'मुद्दा ,
बस यही है ||

9 comments:

शालिनी कौशिक said...

सोचते हैं
देखते हैं.
जानते हैं ,
ढूंढते हैं.
चाह कर भी नहीं चाहते हैं ,
बचना इससे सभी चाहते है.
ये वही है
ये वही है .
सुन्दर प्रस्तुति

शिखा कौशिक said...

बहुत खूब लिखा है .आभार

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खुबसूरत....

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शालिनी ---खूब सूरत लिखा..

धन्यवाद शिखा व सुषमाजी ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

इस छिद्रान्वेषी को तो मानसिक इलाज की सख्त जरूरत है!

DR. ANWER JAMAL said...

पोस्ट और टिप्पणी दोनों अदभुत हैं।

डा. श्याम गुप्त said...

क्या
है भी तू,
है भी नहीं है|.... उसी (ईश्वर) को...

सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी ..धन्यवाद

डा. श्याम गुप्त said...

--धन्यवाद जमाल साहब...पोस्ट तो अद्भुत है ही....
'अंदाज़े बयां हो श्याम का
वो न्यारी गज़ल होती है |....पर
..खुदा की शान में आज तक एसी बेमिसाल टिप्पणी नहीं पढ़ी होगी.. .क्या बात है वाह! वाह !..बहुत खूब ..अब आप सब समझिए किसे क्या ज़रूरत है ......

Rahul Kumar Paliwal said...

Bahut khub.