मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, August 11, 2011

आदमी और जानवर

दी गई हैं उन्हें सज़ाएं कि जो
जानवर का शिकार करते हैं
और छोड़ा गया उन्हें आज़ाद
आदमी पर जो वार करते हैं
हलीम साबिर

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

रक्षाबन्धन की बहुत-बहुत शुकामनाएँ!
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आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

DR. ANWER JAMAL said...

Nice .

dr. shama khan said...

dekhen mea choten lege ghave kere gembher......ko sarthek kertee pencteya hea..behot khoob..

Rajesh Kumari said...

kya khoob kaha.poorntah sahmat hoon.

शिक्षामित्र said...

हमारे समय की यही विडम्बना है।

शालिनी कौशिक said...

सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति बधाई

Sanat Pandey said...

jitna chota hai utna hi khonta hai.

Sanat Pandey said...

jitna chhota hai utna hi khonta