मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, August 10, 2011

रुबाई ....जंग...ड़ा श्याम गुप्त.....

घर हो   बाहर हो   जंग  हर जगह  पे  जारी है |
कहीं सांस्कृतिक हमला है कहीं आतंकी तैयारी है|
खुशनसीं  हैं 'श्याम, जो  देश की सरहद  पे  लड़े -
अंदर के दुश्मनों से लड़ें अब हमारी बारी है ||



5 comments:

वन्दना said...

सही कहा।

sushma 'आहुति' said...

bhaut khub...

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद वन्दना जी व सुषमा जी.....बाहर के दुश्मन तो दुश्मन के रूप में आते हैं, परन्तु अंदर के दुश्मन तो अपनों के रूप में होते हैं , पहचान में कठिनाई से आते हैं ...

dr. shama khan said...

her aadme mea yhe bhev anne aur apna kertevye semjhna zerore hea..very nice thought with depth...

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद , शमा जी....शमा जलाए रखिये....