मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, August 3, 2011

कतआ ---ड़ा श्याम गुप्त......

पहले खुद को , तो खुदी में  निहारो यारो |
सूरतो-दिल को ,  आईने  में उतारो यारो |
फिर ये कहना, मेरे अशआर नहीं है काबिल-
अपनी ग़ज़लों के पुर-अक्श तो संवारो यारो ||

4 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर...

prerna argal said...

बहुत ही सुंदर /बधाई आपको

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद प्रेरणा जी व सुषमा जी.....

शालिनी कौशिक said...

वाह बहुत खूब.