मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, July 27, 2011

रहने दीजिए ...गज़ल...ड़ा श्याम गुप्त...

दिल में ही दिल की बात अब रहने दीजिये |
पर्दों का है चलन यहाँ अब रहने दीजिये |

हर राज खुल ही जाए दस्तूर तो नहीं ,
पर्दों  की बात पर्दे में सब रहने दीजिये |

हर बात खुल ही जाए होंगीं रुसबाइयां ,
परदों का भी गुरूर तो कुछ रहने दीजिये |

हमने बहुत चाहा कहें दास्ताने दास्ताँ ,
वो चुप थे होठों ने कहा चुप रहने दीजिये |

वो लम्हे वो बातें वो मुलाकातें क्या कहें ,
यादें ही रह गयीं हैं  उफ़ रहने दीजिये |

जो आज तक जीते रहे वो भ्रम न तोडिये, 
हम खुश हैं ख्बावो-ख्याल में खुश रहने दीजिये |

कतराते रहे महफ़िलो-शम्मा से  हम तो श्याम ,
अब आगये तो क्या कहें अब रहने दीजिये ||

7 comments:

शालिनी कौशिक said...

bahut khoob kaha shyam ji aapne.badhaiyan bahut bahut.

DR. ANWER JAMAL said...

Nice.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

रहने दीजिए!
बेजान अशआर हैं सारे ही!

DR. ANWER JAMAL said...

हा हा हा
क्या अशआर में भी अब प्राण प्रतिष्ठा करनी पड़ेगी ?
@ डाक्टर साहब, देखिए आपको शिकायत थी कि लोग अपनी टिप्पणी में सम्यक समीक्षा नहीं करते। उम्मीद है कि अब आपकी शिकायत दूर हो गई होगी।

ana said...

kya baat hai wah bhai wah

डा. श्याम गुप्त said...

---सही बात है अनवर जी , कला व कविता में प्राण होना ही चाहिए , तभी तो वह प्रभावकारी होगी...
----यह अलग बात है कि समीक्षक को स्वयं पता होना चाहिए कि प्राण अर्थात कविता की "जान" क्या होती है---
--नहीं.. अनवर जी... की गई टिप्पणी समीक्षा नहीं है, सिर्फ अपना व्यक्तिगत विचार है , समीक्षा जब होती है जब --प्रत्येक बिंदु पर कारण स्पष्ट किया जाय----उसके लिए काव्य, भाषा व साहित्य के विशद ज्ञान की आवश्यकता होती है....
---जहाँ बात दिल की हो वहाँ बेजान का सवाल क्या?????

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद अना जी, अनवर जी , शालिनी व शास्त्री जी....