मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, July 3, 2011

तेरा हर अंदाज़ ग़ज़ल ....ड़ा श्याम गुप्त .....

तेरे तो दिन रात ग़ज़ल |
तेरी तो हर बात ग़ज़ल |

प्रेम प्रीति की बात ग़ज़ल |
मुलाक़ात की बात ग़ज़ल |

मेरे  यदि नग्मात ग़ज़ल,
तेरा  हर अल्फाज़  ग़ज़ल |

तेरे दर का फूल ग़ज़ल,,
पात पात हर पात ग़ज़ल |

हमें भुलादो बने ग़ज़ल,
यादों की बरात ग़ज़ल |

तू   हंसदे  होजाय ग़ज़ल,
अश्क अश्क हर अश्क ग़ज़ल |

तेरी  शह की बात ग़ज़ल,
मुझको तेरी मात ग़ज़ल |

तू  हारे  तो  क़यामत हो,
तेरी जीत की बात ग़ज़ल |

हंस   देख  कर शरमाए ,
चाल तेरी क्या बात ग़ज़ल |

मेरी बात  पै  मुस्काना,
तेरे ये ज़ज्वात ग़ज़ल |

तेरी लट का खुल जाना,
तेरा हर अंदाज़ ग़ज़ल |
,
तेरी  गज़लों  पर  मरते,
कैसी सुन्दर घात ग़ज़ल |

श्याम' सुहानी ग़ज़लों पर,
तुझको देती दाद  ग़ज़ल ||

13 comments:

शिखा कौशिक said...

मेरी बात पै मुस्काना,
तेरे ये ज़ज्वात ग़ज़ल |
bahut khoob ...

शालिनी कौशिक said...

श्याम' सुहानी ग़ज़लों पर,
तुझको देती दाद ग़ज़ल ||

kaha rahe the jab aap ise ,

sun rahi thi ise gazal.
bahut sundar ..............

रविकर said...

मतलब सब गजल ही गजल है उधर ||

बधाई भाई जी ||

DR. ANWER JAMAL said...

जो पढ़ ले तेरी ग़ज़ल
आ जाए उसकी अजल

अजल-मौत
अर्थात वह तमन्ना करेगा कि काश इस ग़ज़ल को पढ़ने से पहले मुझे मौत आ गई होती।
‘अल्फ़ाज़‘ के साथ ‘हर‘ नहीं कहा जाएगा क्योंकि अल्फ़ाज़ बहुवचन है।
लफ़्ज़ का अर्थ है शब्द और अल्फ़ाज़ का अर्थ है शब्दों।

ऐसे ही आपने ‘नग्मात‘ लिखा है जबकि सही है ’नग़मात‘।
सही शब्द है जज़्बात और आपने लिखा है ‘ज़ज्वात‘।

और कमियां मैं बताऊं कैसे ?
इतना ‘टैम‘ मैं लाऊं कैसे ?

अब आप मुझे कहीं किसी के शब्द और मात्रा में ग़लतियां बताते हुए न दिख जाएं महोदय !!!

नीरज गोस्वामी said...

सब कुछ ग़ज़ल है मान लिया लेकिन इस ग़ज़ल के काफिये कैसे बदल गए...ये कहाँ से हुई ग़ज़ल, ?

नीरज

डा. श्याम गुप्त said...

काफिया कहाँ बदला गुसाईं जी..बताएं .ठीक करना चाहता हूँ...

डा. श्याम गुप्त said...

--सही कह रहे होंगे अनवर जी यह हिन्दी उर्दू के मेल की भाषा-हिन्दुस्तानी है...अलफ़ाज़/ अल्फाज़ , नगमात/नग्मात --हम दोनों ही प्रयोग करते हैं...हमारी उर्दू इतनी अच्छी..फारसी मिश्रित नहीं है ..
--- हमारे यहाँ तो अजल का अर्थ है ,पानी रहित = जो पानीदार न हो, अब पानीदार का अर्थ पूछिए....
---अब प्रेमिका के साथ बात करते करते मौत भी आजाये तो उसे ज़न्नत नसीब होगी...

sushma 'आहुति' said...

bhut khubsurat ye gajal hai...

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद रविकर् जी,--हाँ भई उधर तो संब गज़ल ही गज़ल है...
हुश्न वालों की बातें, अब क्या कहें श्याम |
न वाकया न काफिया फिर भी गज़ल होती हैं ||

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डा. श्याम गुप्त said...

धनयवाद शिखा व शालिनी ..
सुनकर मेरी गज़ल, कहने लगी गज़ल,
हम ही बसे हैं आपकी ग़ज़लों की रूह में|

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद सुषमा जी...

हमसा सुखनवर औ आपकी दाद,
ये जुगलबंदी भी गज़ल होती है |

Pappu Parihar said...

किधर से शुरू करून, किधर से ख़तम करून |
जिन्दगी का फ़साना, कैसे तेरी नज़र करून |
है ख्याल जिन्दगी का, कैसे मुनव्वर करून |
मगरिब के जानिब खड़ा, कैसे तसव्वुर करून |

डा. श्याम गुप्त said...

--बहुत खूब पप्पू जी...
तू जहां खड़ा हो, वहीं से राह शुरू होती है|
तू शुरू तो कर ,ज़िंदगी इक सफर होती है|