मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, July 7, 2011

अशआर

अशआर
जिसके नगमों का हर लफ्ज़ असर करता है
ऐसे शायर का तो अंदाज़ अलग होता है .

वो हकीकत को शायरी में ढाल देता है
मगर उसको न कभी खुद पे नाज़ होता है .

वो करता शुक्रिया हौसला अफजाई का
खुशामदों से मगर वो नाराज़ होता है .

जहाँ पर ख़त्म होता है दुनिया का हुनर
वही से उसके हुनर का आगाज़ होता है .

वो दोस्तों के लिए है बड़ा मासूम मगर
दुश्मनों के लिए वो चतुर बाज़ होता है .

वो हर अशआर में दिल खोलकर रख देता है
उसके दिल में नहीं कोई साज़ होता है .

कैसे लिख लेता है दिल को चीरती सी ग़ज़ल
खुदा जाने या वो ; एक raaz होता है
shikha kaushik

5 comments:

शालिनी कौशिक said...

वो हर अशआर में दिल खोलकर रख देता है
उसके दिल में नहीं कोई साज़ होता है
vah bahut khoob

sushma 'आहुति' said...

bhut hi acchi rachna....

डा. श्याम गुप्त said...

वाह वाह ..क्या बात है......एक मुकम्मिल गज़ल....

DR. ANWER JAMAL said...

वाह क्या मुकम्मल चोट है खोट पे !

Pappu Parihar said...

आगाज़ पसंद आया, अन्दाज़ पसंद आया |
आपके एक-एक लफ्ज़ को, लाजवाब पाया |