मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, July 27, 2011

अपनी रूह होती .






न मिलती गर जिंदगी हमें फारिग़  अपनी रूह होती,
न पशेमानी कुछ न करने की न रंजीदा अपनी रूह होती .

जिंदगी है इसलिए हमको मिलना  मिलकर बिछड़ना होता,
ये न होती तो न रगबत कोई न तहीदस्त अपनी रूह होती.

जिंदगी नाम फ़ना होने का न मय्यसर तुम्हे कुछ होगा,
न ज़बूँ तुमको ही मिल पाती न खुश्क अपनी रूह होती.


न होते मुबतला उजालों  में तुमको मेरे लिए मोहलत होती ,
तब न महदूद मेरी  उमरे-तवील तब न शाकी अपनी रूह होती.

न समझो शादमां मुझको न  मसर्रत हासिल ''शालिनी''को ,
बुझेगी शमा-ए-जिंदगी जिस रोज़ कर तफरीह अपनी रूह होती.

                                     शालिनी कौशिक 



6 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

शालिनी जी ! आप लगातार उर्दू सीखती जा रही हैं। लेकिन
फ़राग़त के बजाय फ़ारिग़ शब्द होना चाहिए
रूग़बत के बजाय रग़बत लिखा जाता है।
‘ज़बूं‘ शब्द आपने यहां क्यों इस्तेमाल किया है ?
पढ़ने वाले पर क्लियर नहीं हो रहा है।
आपका आखि़री वाक्य भी उलझ गया है।
आपकी कोशिश अच्छी है लेकिन पहली वाली रचना जैसी रवानी इसमें नहीं है।
और यह हौसला तोड़ने वाली बात नहीं है बल्कि मात्र एक सलाह है ताकि आप सुधार कर सकें और जब कोई देखे तो वाह कर उठे दिल से।
यहां ज़्यादातर लोग इतना लंबा न लिखकर ‘सुंदर प्रस्तुति‘ लिखकर निकल जाते हैं और लिखने वाले में कमी बनी रहती है।
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/1-virrtual-step-to-be-unite.html

शालिनी कौशिक said...

dr.sahab ham yahan likhte hi isliye hain ki hamari kami pata chalen aur ham aapke shukrguzar hain ki aapnesahi bate batayi.aabhar

शालिनी कौशिक said...

zaboon ki jagah kopi sahi shabd batyenge.dr.sahab

डा. श्याम गुप्त said...

न ज़बूँ तुमको ही मिल पायेगी न खुश्क अपनी रूह होती....

---हर शेर में 'होती' शब्द है ...इस मिसरे में 'पायेगी' शब्द काल-व्यतिक्रम है.. अर्थात लगातार भूत काल की बात होरही है यहाँ भविष्य काल दर्शित है.. ...मिल पाती शब्द हो तो ठीक रहेगा...
--कठिन उर्दू है...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बढ़िया अशआरों से सजी हुई बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

कुश्वंश said...

अच्छे शब्द ,बेहतरीन , बधाई