मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, July 30, 2011

जख्म देकर जाएँगी.

उलझने हावी हैं दिल पर कब तलक ये जाएँगी,
जिंदगी लेके रहेंगी या तहीदस्त जाएँगी.

है अजब अंगेज़ हाल-ए-दिल हमारा क्या कहें,
मीठी बातें उनकी हमको खाक ही कर जाएँगी.

भोली सूरत चंचल आँखें खींचे हमको अपनी ओर ,
फसलें-ताबिस्ता में ये यकायक आग लगा जाएँगी.

रवां-दवां रक्स इनका है इसी जद्दोजहद में ,
कैसे भी फ़ना करेंगी ले सुकून जाएँगी.

सोच सोच में व्याकुल क्या करेगी ''शालिनी''
जाते जाते भी उसे ये जख्म देकर जाएँगी.

                    शालिनी कौशिक


5 comments:

शिखा कौशिक said...

bahut khoob .aabhar

Pappu Parihar said...

"उलझने" बहुत उम्दा बयाँ की आपने जिन्दगी की सच्चाई |

DR. ANWER JAMAL said...

उर्दू सीखने का जज़्बा हो तो ऐसा हो।
आप बिल्कुल भी तहीदस्त जाने वाली नहीं हैं क्योंकि आपके सरपरस्त मौजूद हैं।
शुक्रिया सीखने की एक मिसाल क़ायम करने के लिए ।

sushma 'आहुति' said...

जाते जाते भी उसे ये जख्म देकर जाएँगी... bhaut hi khubsurat gazal...

डा. श्याम गुप्त said...

बहुत कठिन उर्दू है ...समझ में नहीं आयी गज़ल....