मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, July 26, 2011

खुदगर्जी तुम्हारी ...

हिन्दी कवयित्री मोहतरमा अनुराधा जी ने हमारी फरमाइश पर यह कविता भेजी है. 
आप भी इसका लुत्फ़ उठायें . यह एक कोशिश है कवियों और शायरों को एक साथ लाने की .



खुदगर्जी तुम्हारी ............

 काश मेरे मन के भावो को
 थोडा ओर
 पढ़ लिया होता
 काश मुझे थोडा सा ओर
  समझ लिया होता
छू तो लिया था मेरे
अंतर्मन  को तुमने
काश थोडा ओर साथ
देते तुम तो ....
मेरी ख़ुशी की थाह
पा ली होती तुमने
काश मै  पहले रूठ
गई होती  तो
कम से कम तुमने
मुझे माना तो  लिए होता
हम साथ चलते
दो कदम ...तो
उसी से मंजिल को पा
लिया होता
तुमने ने सुनी नहीं
आह मेरी
नहीं तो आंसुओ की आहट को
 तुमने पहचान  लिया होता
  मै तो यूँ ही खड़ी रही
इस चिलचिलाती धूप में
भूलती नहीं हर ख़ुशी
संजोया नहीं कोई गम
काश उस सिहरन को तुमने
महसूस किया होता
मेरे पवित्र मन की चाह को ..
क्यों तुम देख कर भी
देख ना सके
मेरी परवाह को .......

मै तो आज भी दीप लिए
वहीँ खड़ी हूँ
पर छू लूँ तुम्हे कैसे ?
तुम में अब भी
है वही ..
खुदगर्जी के भाव.......
(अनु )

10 comments:

Mukesh Kumar Sinha said...

kya baat hai, aap to har jagah agaaj kar rahe ho:D

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

only one word...

aafareen!

राजीव तनेजा said...

भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...
बहुत बढ़िया...

रविकर said...

शानदार प्रस्तुति, बधाई ||

शालिनी कौशिक said...

मै तो आज भी दीप लिए
वहीँ खड़ी हूँ
पर छू लूँ तुम्हे कैसे ?
तुम में अब भी
है वही ..
खुदगर्जी के भाव.......
nari man ke bhavon kee sundar abhivyakti.
aur bahut sundar prastuti.aabhar dr.anwar jamal ji.

रेखा श्रीवास्तव said...

मै तो आज भी दीप लिए
वहीँ खड़ी हूँ
पर छू लूँ तुम्हे कैसे ?
तुम में अब भी
है वही ..
खुदगर्जी के भाव.......

अनु बहुत सुंदर लिखा है, ये पंक्तियाँ तो माँ को छू गयी. आभार !

sushma 'आहुति' said...

मै तो आज भी दीप लिए
वहीँ खड़ी हूँ
पर छू लूँ तुम्हे कैसे ?
तुम में अब भी
है वही ..
खुदगर्जी के भाव.......very touching lines....

ana said...

baht sundar aur dil ko choo lene wali prastuti .

mere post par aapne anuvad ke liye kaha tha maine koshish kiay ho sake to avshya padhaare
http://dhwanita.blogspot.com/2011/07/blog-post_27.html

DR. ANWER JAMAL said...

@ Ana ji ! अनुवाद होने के बाद अब मंशा पूरी तरह समझ पा रहा हूँ .
इस वीडियो का लिंक भी दीजिये ताकि इसे साथ लगाया जा सके . इस गाने का तरन्नुम दिल में क्यों उतरता जाता है ?

शुक्रिया .

आमार मुक्ति आलोय आलोय

আমার মুক্তি আলোয় আলোয় এই আকাশে,
আমার মুক্তি ধুলায় ধুলায় ঘাসে ঘাসে॥
দেহ মনের সুদূর পারে হারিয়ে ফেলি আপনারে,
গানের সুরে আমার মুক্তি উর্ধ্বে ভাসে॥
আমার মুক্তি সর্বজনের মনের মাঝে,
দুঃখ বিপদ তুচ্ছ করা কঠিন কাজে।
বিশ্বধাতার যজ্ঞশালা, আত্মহোমের বহ্নি জ্বালা
জীবন যেন দিই আহুতি মুক্তি আশে॥



आमार मुक्ति आलोय आलोय एई आकाशे

आमार मुक्ति धूलाय
धूलाय घासे घासे


देह मोनेर सुदूर पारे हारिये फेली आपोनारे
गानेर सूरे आमार मुक्ति उर्ध्वे भासे

आमार मुक्ति सर्ब्बोजोनेर मोनेर माझे
दू:ख बिपद तुच्छ कोरा कोठीन काजे

बिश्वधातार यज्ञशाला,आत्म होमर बह्निजाला
जीबों जानो दी आहुति मुक्ति आशे


उपरोक्त गाने का आशय को अक्षुण रखते हुए अनुवाद करने की कोशिश करती हूँ :

आलोक से भरा इस आकाश में ही मेरा मोक्ष है छिपा
इन धुल कणों में ,इन तृणों में मेरा मुक्ति है छिपा

देह मन के सुदूर छोर है जहां
मन मेरा खो जाता है वहां
इन गीतों के सुरों के उर्ध्व में मेरी मुक्ति है छिपा

मेरी मुक्ति सर्वजनो के ह्रदय में है छिपा
दू:ख विपद को तुच्छ करता हुआ कठिन कामो में है बसा

विश्व विधाता के यज्ञशाला में
आत्मा होम के अग्निशाला में
मै अपने जीवन की आहुति दे दूं
मुझे मुक्ति मिल जाए

Rajiv said...

Very touching and filled with honest feelings.Nice poem.