मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, July 21, 2011

सावन के ज़ख़्म

ये मौसम ए बरसात हमें रास न आया
जो ज़ख़्म हरे होते वही सूखे पड़े हैं
बहने दो मेरे अश्क, कि यादों का है मौसम
सावन मे तो उतरे हुए दरिया भी चढ़े हैं

7 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

बहुत ख़ूब !

Kunwar Kusumesh said...

वाह.क्या बात है.

शालिनी कौशिक said...

बहुत खूब वाह

prerna argal said...

bahut badiyaa shstriji kya baat hai.badhaai aapko.

डा. श्याम गुप्त said...

वाह क्या बात है...सावन सूखे न भादों हरे...

शिखा कौशिक said...

बहुत खूब .इस बार तो आषाढ़ में भी खूब बरसात हुई है .

sushma 'आहुति' said...

bhaut hi khubsurat...