मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, July 20, 2011

देख लेना तब जिस्म में रूह न रहेगी.



इस कदर धोखे मिलेंगे ज़माने में,
            तो ये जिंदगी जिंदगी न रहेगी.
कैसे जी पाएंगे इस ज़माने में ,
               जो आपकी नज़रें इनायत न रहेंगी.

तुमको पाने की खातिर दुनिया में,
                 चाहा अनचाहा बहुत कुछ कर गए.
क्या तुम मिलोगे हमें तब जाकर ,
             जब इन चिरागों में रोशनी न रहेगी.

अब तो चाहत है बस यही अपनी ,
                तुमको कभी कभी याद आ जाएँ हम .
हमसे मिलने भी  आओगे गर तुम,
                देख लेना तब जिस्म में रूह न रहेगी.
-- 
शालिनी कौशिक 

5 comments:

sushma 'आहुति' said...

हा बिलकुल सही कहा आपने बहुत कुछ ऐसा हो जाता है हमारे आस-पास की उसकी हमें उम्मीद भी नही होती... अच्छी पंक्तिया...

prerna argal said...

dil main uthe jajbaton ko kalam main doboker rachanaa main utaraa hai.dil ke dard ko shabdon main utaraa hai,nice post.

शिखा कौशिक said...

शालिनी जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति .आभार .

Vivek Jain said...

bahut hee sundar rachanaa,

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छी रचना ---