मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, July 18, 2011

कब हकीकत को जानूंगा ?

कई रातें तेरी यादों में काटी
बार बार दिल को समझाया
कल सुबह नया सूरज उगेगा
मुखड़ा तेरा नज़र  आयेगा
हर सुबह पहले से बदतर
होती रही
तुमसे दूरी निरंतर बढ़ती रही
अब खुद से सवाल करता हूँ
कब हकीकत को जानूंगा ?
कब तक 
 बेबसी में ज़िन्दगी काटूंगा 
 दिल को भरमाऊंगा ?
खुद ही जवाब देता हूँ 
जब तक बहलेगा,बहलाऊंगा
नहीं बहलेगा तो जान दे दूंगा
18-07-2011
1200-80-07-11

6 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

Nice way to die.

डा. श्याम गुप्त said...

--- , न ये कविता है, न नज़्म, न गज़ल --हाँ आरज़ू अच्छी है...

prerna argal said...

bahut achchi aarjoo liye anoothi prastuti.badhaai aapko.




please visit my blog.thanks.

sushma 'आहुति' said...

very very nice...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत उम्दा प्रस्तुति!

शालिनी कौशिक said...

बहुत वेदनापूर्ण भावाभिव्यक्ति.वाह बहुत खूब