मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, July 17, 2011

लघु नज्में ... ड़ा श्याम गुप्त...

  १ .   लाफानी..
तेरा  लासानी चेहरा,
तेरा नाम लासानी,
मेरे दिल में बस गया है-
होकर लाफानी |

  २. गूंगा इंसान...
कुछ लम्हे ज़िंदगी के,
दिल की पेचीदगियों को ,
इस तरह छू जाते हैं कि-
इंसान गूंगा होजाता है |

        ३.कौसे कुजह ....
बिखरे जल में खुद  बिखर बिखर,
आफताबी -शुआएँ बिखरातीं ,
 कुछ  रंगबिरंगे ख़्वाबों को ;
दुनिया कहती है , कौसे कुजह | 

      ४.खुशी .....
खुशी के लम्हे,
बरसात की बूंदों की तरह;
ठंडक तो देते हैं , पर--
पकड़ में नहीं आते ||

---लासानी= सुन्दर,  लाफानी = अमर,   कौसे कुजह = इन्द्रधनुष ,   आफताबी शुआएँ = सूरज की किरणें ,   ख़्वाब = स्वप्न ,    लम्हे = क्षण .पल ....

6 comments:

रविकर said...

बधाई श्याम जी ||

भाई मुझे गजल और नज्म का अंतर समझिए ||

कई जगह मैं पूंछ चुका पर उत्तर न मिला ||

मैं इन से खुद को बहुत प्रभावित पाता हूँ ||

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत नज़मे...

Vivek Jain said...

बेहद खूबसूरत,
साभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

डा. श्याम गुप्त said...

--धन्यवाद सुषमा जी व विवेक जी....

--धन्यवाद ..रविकर जी , वैसे तो मैं कोई शास्त्रीय अर्थात उस्ताद शायर नहीं हूँ ..काम चलाऊ शायर ही हूँ ....हाँ साधारणतया ...नज़्म को आप अतुकांत व तुकांत कविता/ गीत की भांति समझिए जो लघु व लंबे, गेय व अगेय दोनों तरह से लिखी/कही जाती हैं
---जबकि गज़ल ( गज़ल का मूल अर्थ है हसीनों से हसीं बातें ) उर्दू शायरी की एक खास विधा है जो सिर्फ गेय होती है एवं कुछ नियमों से बंधीं होती है( हिन्दी के शास्त्रीय छंदों की भांति ) यह कम से कम ५ शेरों की (अत्यावश्यक नहीं ) मालिका होती है|
--- इसमें पहला शेर मतला कहा जाता है जिसमें अन्तिम शब्द रदीफ कहलाता है जो दोनों पंक्तियों में एक ही होना चाहिए|( उदाहरण ...चाहिए ..तो वही रदीफ( चाहिए, है , हो, जाना , होता है , ज़िंदगी देदी ... ) अन्य सभी शेरों की दूसरी पंक्ति में के अंत में आना चाहिए |
--- रदीफ से पहले का शब्द काफिया कहलाता है जो हिन्दी कविता का तुकांत शब्द की भांति होता है और प्रत्येक शेर की दूसरी पंक्ति में एक लय तुकांत होना चाहिए ..जैसे ..गया , बया, हया ....जाना , माना, खाना, आना आदि ..
---अंतिम शेर जिसमें शायर अपना नाम, उपनाम या तखल्लुस.. प्रयोग करता है उसे मकते का शेर कहते हैं|
--------अब ट्राई मारिये.... देखें क्या बनता है...

शालिनी कौशिक said...

खुशी के लम्हे,
बरसात की बूंदों की तरह;
ठंडक तो देते हैं , पर--
पकड़ में नहीं आते ||
ताज्जुब है डॉ.श्याम जी,
ख़ुशी और आपकी पकड़ से बाहर.बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.बधाई.

डा. श्याम गुप्त said...

किस की पकड़ आये हैं, वो लम्हे वो पल ,
जी लीजिए इस आज को,आता नहीं है कल |