मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, July 11, 2011

पुराने साथी

जो दूर हो गए थे नज़दीक आ रहे हैं
लगता है साथियों का मेला लगा रहे हैं ।
अब कैद मे घबराएगा नही दिल
राजा का साथ देने मारन भी आ रहे हैं ।
तहसीन मुनव्वर

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत खूबसूरत अशआर हैं!

sushma 'आहुति' said...

बहुत खूब...

Kanishka Kashyap said...

हम अशआर यूँ पिरोतें रहे ..बस याद तुम आती रहो..
घूल उठेंगे .तमन्नाओं के अब्र ..बस धुप बन छाती रहो ..

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत अच्छे शे'र हैं ....साथियो का मेला तो हर शख्स पसंद करता हैं ....

कुश्वंश said...

बहुत खूबसूरत

Dr. Ayaz Ahmad said...

दाद देने के लिए आप सभी लोगों का शुक्रिया

शालिनी कौशिक said...

बहुत खूब मुन्नवर जी

शालिनी कौशिक said...

शानदार प्रस्तुति अयाज़ जी आभार