मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, July 8, 2011

हस्ती है-सरपरस्ती है..... ड़ा श्याम गुप्त....

बात उसकी  जो सदा छपती है |
मानिए  ऊंची  सरपरस्ती  है |

आपकी  बातों में हो  दम  चाहे,
उनकी नज़रों को नहीं जचती है |

वे कहें, उनकी तरह सोचें -लिखें ,
कैसी नज़रों  की  तंगदस्ती  है |

पैर छुएं झुक झुक के सलाम करें ,
आपको  ये बात कहाँ पचती  है  |

नई  सोच  से परहेज़  है  उन्हें ,
गोया  ये बात  बड़ी सस्ती है |

सारे समाज को  ही  ले डूबेगी,
यह सोच इक ज़र्ज़र कश्ती है |

देश समाज  जाए भाड़ में  चाहे,
उनकी अपनी तो मौज-मस्ती है |

हाथ लंबे , पहुँच  ऊपर तक  है,
तेरी भी  'श्याम  कोई हस्ती है ||

4 comments:

Dr. Ayaz Ahmad said...

अति सुंदर

रविकर said...

देश समाज जाए भाड़ में चाहे,
उनकी अपनी तो मौज-मस्ती है


बहुत सुन्दर ||

बधाई--

शालिनी कौशिक said...

हाथ लंबे , पहुँच ऊपर तक है,
तेरी भी 'श्याम कोई हस्ती है |

hamne kab isse inkar kiya hai dr.shyam ji.bahut khoob.

डा. श्याम गुप्त said...

dhanyavaad ayaaz jee, ravikar va shaalinee jee....