मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, July 5, 2011

वो सड़क दूर तक आज वीरान है



जो जहाँ है ,वहीँ पर परेशान है.
वक़्त सब पर बराबर मेहरबान है .
पूरी दुनिया की रखता है यूँ तो खबर
आदमी सिर्फ अपने से अंजान है.
बेरुखी ही मिलेगी यहाँ हर तरफ
ये शहर है ,यही इसकी पहचान है.
जिसपे मिलते थे इंसानियत के कदम
वो सड़क दूर तक आज वीरान है.


 शायर-लक्ष्मी शंकर वाजपेयी.
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

13 comments:

शिखा कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

Vivek Jain said...

बहुत खूब

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

कुश्वंश said...

बहुत खूब ,सुबहानल्लाह

रविकर said...

जिसपे मिलते थे इंसानियत के कदम
वो सड़क दूर तक आज वीरान है ||

बहुत सुन्दर भाव ||


बधाई |

Pappu Parihar said...

किधर से शुरू करून, किधर से ख़तम करून |
जिन्दगी का फ़साना, कैसे तेरी नज़र करून |
है ख्याल जिन्दगी का, कैसे मुनव्वर करून |
मगरिब के जानिब खड़ा, कैसे तसव्वुर करून |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बढ़िया अशआर!
अच्छी ग़ज़ल!

Sawai SIingh Rajpurohit said...

सुन्दर और बेहतरीन ग़ज़ल.

शालिनी कौशिक said...

aap sabhi ka hardik dhanyawad.

sushma 'आहुति' said...

sunder rachna...

डा. श्याम गुप्त said...

--बहुत खूब पप्पू परिहार जी...
खडे हों जहां पे आप , वहीं से राह होती है|
शुरू तो कर श्याम ,ज़िंदगी इक सफर होती है|

शालिनी कौशिक said...

dhanyawad sushma ji aur dr.shyam gupt ji.

DR. ANWER JAMAL said...

बढ़िया अशआर!
अच्छी ग़ज़ल!

शालिनी कौशिक said...

shukriya dr.anwar jamal ji.