मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, July 2, 2011

फूल क्या उस समूचे चमन को नमन.




है नहीं जीवन ये खाली हाथ मलने के लिए,
जिंदगी होती है गिर गिर कर संभलने के लिए,
इस धरा को नमन,इस गगन को नमन,
दुःख हरे खुशनुमा इस पवन को नमन,
धर्म से पूर्व जो देशहित में चढ़े,
फूल क्या उस समूचे चमन को नमन.

शायर-मदन शर्मा
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

4 comments:

रविकर said...

धर्म से पूर्व जो देशहित में चढ़े,
फूल क्या उस समूचे चमन को नमन.

शालिनी जी एवं शायर को नमन ||

Vivek Jain said...

बहुत सुंदर,
मेरा भी नमन,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

शिखा कौशिक said...

mera bhi naman .bahut sundar

sushma 'आहुति' said...

bhut sunder..