मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, July 1, 2011

बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.




मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,
बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.

जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल,
एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती.

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती.

जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल,
दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती.

बैठे हैं इंतजार में वो मौत के अगर,
आगोश में लेती उन्हें बचने नहीं देती.

                      शालिनी कौशिक 

10 comments:

शिखा कौशिक said...

sach kaha hai mayoosi bahut buri hoti hai .aabhar

DR. ANWER JAMAL said...

आपने बिल्कुल सही कहा है कि इंसान प्यार करता है लेकिन प्यार या तो मिलता नहीं है या मिलकर भी हमेशा क़ायम नहीं रहता है। बहुत तकलीफ़ में घिरा हुआ है इंसान। जीने के नाम पर बस वह सांस ले रहा है।
अरमान कहां पूरे हो रहे हैं ?

dipak kumar said...

bikul sahi insaan kke paresaani ka karn kewal moh aur maya hai pyar bhi moh maya me aata hai
chhotawriters.blogspot.com

sushma 'आहुति' said...

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती...bhut khubsurat panktiya....

कुश्वंश said...

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती

खूबसूरत ग़ज़ल मार्मिक भी बधाई

डा. श्याम गुप्त said...

ख़ूबसूरत गज़ल......

'ये वो ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती(?).'

'दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती...'

@दोनों मिसरों में क्या फर्ख है??
---पहले मिसरे में क्रिया-देती, का असर जहर -कर्ता पर पड रहा है....
---दूसरे में क्रिया देती का असर ..दीवार बनके( अर्थात मायूसी ) पर पड रहा है..
@@ पहले में जहर पुल्लिंग है अतः यहाँ शब्द "देती" गलत है ..देता सही होता है ..
@@ दूसरे में मायूसी स्त्रीलिंग है अतः अन्य स्थानों की भांति 'देती' सही है...

शालिनी कौशिक said...

truti sudharne ke liye aabhar dr.shyam gupt ji.
par main kahti hoon ki main bahut kushal kaviyatri nahi hoon jo man ko sahi lagta hai likh deti hoon aur fir mujhe shayri ka itna gyan bhi nahi hai.aap jaise kabil shayron ke sampark me rah kar shayad main kuchh sudhar apne me kar paoongi.ek bar fir main aapka aabhar vyakt karti hoon.

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शालिनी ..ये शायरी की बात नहीं ....भाषा व काव्य व्याकरण की अर्थवत्ता की बारीकी की बात है ...

"बनके जहर जो ज़िंदगी जीने नहीं देती" ----लो ठीक होगया ---अब देती का प्रभाव मायूसी पर है अतः स्त्रीलिंग ठीक है...

शालिनी कौशिक said...

shyam ji,
aapke kahe anusar maine yahan truti sudhar li hai.aabhar.

Pappu Parihar said...

राहें बिछड़ जाती हैं, मंजिले बदल जाती हैं |
चलते हैं जब जिन्दगी में, तनहायियाँ रह जाती हैं |