मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, July 31, 2011

इब्ने सफ़ी की ग़ज़ल - Anwer Jamal

गिर रहा है तो किसी और तरह ख़ुद को संभाल
हाथ यूं भी तो न फैले कि बने दस्ते सवाल

घर बनाना भी तो असीरी ही कहलाएगा
ख़ुद को आज़ाद समझता है तो ये रोग न पाल

मह-जबीनों ने किसी काम का छोड़ा न हमें
चांद चढ़ता है तो बन जाता है ही का जंजाल

तख्ता ए दार ही बन जाएंगे तेरे शबो-रोज़
दिल की बातों को कभी अक्ल के सांचे में न ढाल

रूह को जिस्म के वीराने में गुम रहने दे
जी बहलने के लिए कम तो नहीं हैं ख़द्दो-ख़ाल

इसी सिनो-साल पे नाज़ां हो मगर सोचो तो
वक्त के पांव की ज़ंजीर नहीं हैं मह-व-साल

तुम समझते हो कि है तख्ता ए गिल मेरा जहां
वो घुटन है कि मुझे सांस भी लेना है मुहाल

शब्दार्थ

दस्ते सवाल-याचना के लिए फैला हुआ हाथ, असीरी-क़ैद,
मह जबीन-चांद जैसे दमकते माथे वाली सुंदरी,
तख्ता ए दार-मुजरिम को फांसी के समय जिस तख्ते पर खड़ा किया जाता है
शबो रोजत्ऱ-रात दिन, ख़द्दो ख़ाल-रूपाकृति, सिनो साल-यहां आयु अभिप्रेत है
नाज़ां-गर्वोन्मत्त, मह व साल-माह और साल
तख्ता ए गिल-रज पट्ट अर्थात यह भौतिक संसार, मुहाल-मुश्किल

11 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर गज़ल्।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

इब्ने सभी की ग़ज़ल पढञवाने के लिए शुक्रिया!
बहुत अच्छा आलेख!
--
पन्तनगर की सैर के लिए गया था!
पूरे 30 घंटे बाद नेट पर आया हूँ!
धीरे धीरे सबके यहाँ जाने का प्रयास जारी है!

Kunwar Kusumesh said...

बहुत दिनों बाद यहाँ अच्छा कलाम दिखा .आभार.

Anjana (Gudia) said...

तख्ता ए दार ही बन जाएंगे तेरे शबो-रोज़
दिल की बातों को कभी अक्ल के सांचे में न ढाल

:-) bahot khoob... in sahab ka kalaam padwaane ke liya shukriya, Anwar bhai

शालिनी कौशिक said...

ibne safi ji ki ye gazal padhvane ke liye aur hamari dairy me kuchh aur naye alfaz shamil karane ke liye shukriya dr.sahab.

sushma 'आहुति' said...

khubsurat gazal....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

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रविकर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति महोदय ||

बधाई स्वीकार करें ||

PAVAN ramjan MAS KI BADHAAI

udaya veer singh said...

घर बनाना भी तो असीरी ही कहलाएगा
ख़ुद को आज़ाद समझता है तो ये रोग न पाल

brilliant creation with sensible
mind . thanks

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छी गज़ल है बिना रदीफ की , सिर्फ काफिया ही काफिया है......