मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, June 27, 2011

दुआएं तेरी क्यूँ हो गयीं बेअसर...: Saleem Khan

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मंज़िले-जाविदाँ की पा सका न डगर
पूरा होके भी पूरा हो सका न सफ़र

दुआएं तो तुने भी की थी मेरे लिए
दुआएं तेरी भी क्यूँ हो गयीं बेअसर

मुश्किल कुछ भी नहीं इस जहाँ में
साथ तेरा जो मिल जाए मुझे अगर

दिखा जब से मुझे सिर्फ तेरा ही दर
तब से ही भटक रहा हूँ मैं दर ब दर

जब तू समा ही गयी है मेरी नज़र में
तो अब क्यूँ नहीं आ रही है मुझे नज़र

10 comments:

शालिनी कौशिक said...

दुआएं तो तुने भी की थी मेरे लिए
दुआएं तेरी भी क्यूँ हो गयीं बेअसर

sachche dost hain aapke agar
duain unki n hongi beasar.

bahut shandar likha hai saleem ji.mubaraq ho.

नीरज गोस्वामी said...

बेहतरीन

नीरज

सलीम ख़ान said...

SHUKRIYA SHALINI JEE

सलीम ख़ान said...

neeraj bhai dhanywaad !

शिखा कौशिक said...

मुश्किल कुछ भी नहीं इस जहाँ में
साथ तेरा जो मिल जाए मुझे अगर

bahut khoob Saleem ji hamesha ki tarah .

सलीम ख़ान said...

thanks shikha jee

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
इस खूबसूरत ग़ज़ल का जवाब नहीं!

sushma 'आहुति' said...

bhut khubsurat....

डा. श्याम गुप्त said...

सुन्दर गज़ल ...सलीम जी..बधाई ..
.....इसमें भी रदीफ सब शेरो में वही( मतले के साथ वाला ) नहीं है ..काफिया भी भिन्न भिन्न है....
-----इस पर शास्त्री जी का क्या विचार है...

DR. ANWER JAMAL said...

मीन मेख़ जो न निकाले उसे न सताए कोई
जो सच बोलता हो उसे क्यों दबाए कोई

क़ुबूल होती है दुआ बस वही
हलाल खाकर जब हाथ उठाए कोई

रद्द होती ही नहीं दुआ कभी
दिल से सदा तो लगाए कोई

.......
मायूसी कुफ़्र अर्थात नाशुक्री है ।
इंसान के लिए जायज़ नहीं है ।