मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, June 25, 2011

क्या मैं हूँ कमज़ोर या फिर हूँ ताक़तवर: Saleem Khan


क्या मैं हूँ कमज़ोर या फिर हूँ ताक़तवर
क्यूँ फूंक के बैठा हूँ खुद मैं अपना घर

ग़म ज़ेहन में पसरा है तारिक़ी का पहरा है
न रास्ते का है पता अब मैं जाऊं किस डगर

आरज़ू मेरे दिल की क्यूँ तमाम हो गयी
ज़िन्दगी जाएगी किधर नहीं है कुछ ख़बर

अक्स मेरा अब खुद हो गया खिलाफ़ मेरे
चेहरा मेरा खुद क्यूँ नहीं आता है नज़र

तेरा ही सहारा है ऐ खुदा, कर दे मदद
मेरी तरफ़ भी तू कर दे रहम की नज़र

8 comments:

sushma 'आहुति' said...

bhut hi sunder rachna....

DR. ANWER JAMAL said...

भय्ये ख़ैर तो है ?
क्या आजकल ख़ूने जिगर से लिख रहे हो ?

शिखा कौशिक said...

dil se likha hai aapne .anwar ji ke prashan ka uttar jaroor den de .aabhar

शालिनी कौशिक said...

क्या मैं हूँ कमज़ोर या फिर हूँ ताक़तवर
क्यूँ फूंक के बैठा हूँ खुद मैं अपना घर
ye kamjori hai.vaise kisi aur ka ghar foonkna bhi koi taqat kee pahchan nahi hai vah bujdili hoti hai.

ग़म ज़ेहन में पसरा है तारिक़ी का पहरा है
न रास्ते का है पता अब मैं जाऊं किस डगर
jidhar aapka man kahe udhar.

आरज़ू मेरे दिल की क्यूँ तमाम हो गयी
ज़िन्दगी जाएगी किधर नहीं है कुछ ख़बर
khuda par bharosa rakhen sahi rahega.

अक्स मेरा अब खुद हो गया खिलाफ़ मेरे
चेहरा मेरा खुद क्यूँ नहीं आता है नज़र
kyonki aapne khud ko dukh me dhal liya.

तेरा ही सहारा है ऐ खुदा, कर दे मदद
मेरी तरफ़ भी तू कर दे रहम की नज़र
ab kee hai n sahi bat.ab sab sahi hoga.
bahut shandar gazal .saleem ji.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल!
सभी बन्द बहुत खूबसूरत हैं!

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छे अशआर हैं...

घर फूंकने वाले ताकत वर ही होते हैं ..वही कबीर बन पाते हैं .........

संजय said...

क्यूँ फूंक के बैठा हूँ खुद मैं अपना घर :)

सलीम ख़ान said...

@
sushma jee
shikha kaushik jee
shalini kaushik
anwar bhai
shashtri jee
sanjay jee


thanks a lot for ur valuable comments!