मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, June 22, 2011

नेकी ....गज़ल .....ड़ा श्याम गुप्त ...

इक रोज की जो  और  रब ने  ज़िंदगी दे दी |
मत समझिए कि आपको यह ज़िंदगी दे दी |

ज़िंदगी  की  तो न थी शायद जरूरत आपको ,
तुझको   औरों  के  लिए  कुछ   ज़िंदगी  दे दी |

हर रोज  नेकी के लिए  कर मुक़र्रर कुछ वक्त ,
हो  फख्र  तुझको  भी  तुझे  सब  ज़िंदगी दे दी  |

हर सुबह लाती है नया इक ज़िंदगी का पयाम ,
नेकी  के  वास्ते  नयी   इक  ज़िंदगी  दे दी ||

हर रोज सुबह खुदा का, कर शुक्रिया ऐ श्याम ,
इक नयी नेकी वास्ते , फिर   ज़िंदगी  दे दी ||

4 comments:

महेश बारमाटे "माही" said...

हर सुबह लाती है नया इक ज़िंदगी का पयाम ,
नेकी के वास्ते नयी इक ज़िंदगी दे दी ||

bahut khoob...

main bhi is mushayre ka hissa banna chahta hoon...

agar aap logon ki anumati ho...

शालिनी कौशिक said...

हर रोज सुबह खुदा का, कर शुक्रिया ऐ श्याम ,
इक नयी नेकी वास्ते , फिर ज़िंदगी दे दी |
vastav me ham sabko is nek karya ke liye bhagwan ka shukriya ada karna hi chahiye [varna hamare mushayre ka kya hota.]sundar prastuti.aabhar.

Dr. shyam gupta said...

धन्यवाद महेश जी....यह तो खुला मुशायरा है ..स्वागत है...
-- शालिनी जी...शुक्रिया...

शिखा कौशिक said...

हर सुबह लाती है नया इक ज़िंदगी का पयाम ,
नेकी के वास्ते नयी इक ज़िंदगी दे दी ||
bahut sundar Shayam ji .badhai