मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, June 3, 2011

प्रसन्नता


वो एक हंसी पल जब तुम्हे नज़दीक पाया था,
उमड़ आयी थी चेहरे पर हंसी,
सिमट आयी थी करीब जिंदगी मेरी;
मेरे अधरों पर हलकी सी हुई थी कम्पन;
मेरी आँखों में तेज़ी से हुई थी हलचल;
मेरा रोम-रोम घबराने लगा था;
मेरा मन भी भरमाने   लगा था;
तभी किसी ने धीरे से ये कहा था ;
पहचाना मैं हूँ वह कली   ,
जो है तेरी बगिया में खिली;
और प्रसन्नता जिसको कहते  हैं  सभी .
                                      शालिनी कौशिक 

6 comments:

शिखा कौशिक said...

bahut sundar .badhai .

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छे भाव हैं....पर गद्य की बज़ाय...गज़ल या काव्य-भाव में कहा जाय तो खूबसूरत रहेंगे....

वन्दना said...

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/

DR. ANWER JAMAL said...

आपका शुक्रिया कि आपने अपनी यह सुंदर रचना यहाँ हमसे शेयर की ।

शालिनी कौशिक said...

shikha ji,dr.shyam ji,vandna ji,aur dr.anwar jamal sahab aapka shukriya.
anwar jamal sahab aapke kahne par maine ye kavita yahan prastut ki hai vaise main ise yahan ke yogya nahi samjhti thi kyonki me apni kisi bhi kriti ke bare me koi galatfahmi nahi rakhti hoon aur janti hoon ki mushayera utkrisht rachnao ka manch hai.aur meri kriti matr man kee bhavnao kee abhivyakti.

DR. ANWER JAMAL said...

ख़ुशी कभी शास्त्रीय मात्राओं की परवाह नहीं करती । जब वह तन मन में समाती है तो अधर भी कंपकंपाते हैं और रोम रोम भी पुलकित हो उठता है । ये पल यादगार होते हैं । इन्हीं की ऊर्जा के बल पर हम मुसीबतों का बोझ ढोते हैं ।
आपकी रचना सच से ओत प्रोत है और सच मुझे पसंद है । इसीलिए मुझे आपकी यह रचना पसंद आई । जिस रचना को हम पसंद कर लें तो फिर उसके दोष कौन देखेगा ?
बताइये ऐसा कौन ताई का लाल है ?
याद रहना चाहिए कि यह मंच सीखने और सिखाने का मंच भी है और यहाँ हम अपनी ख़ुशियाँ भी शेयर करते हैं ।