मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, June 27, 2011

पीर.....ड़ा श्याम गुप्त....

उसमें घुसने तक का हक नहीं मुझको |
दरो -दीवार जो  मैंने   ही  बनाई है |

मैं  ही  सिज़दे  के काविल नहीं उसमें,
ईंट दर ईंट मस्जिद मैंने ही चिनाई है |

कितावों के पन्नों में उसी का ज़िक्र नहीं ,
पन्नों पन्नों ढली  वो बेनाम स्याही है |

लिख दिये हैं ग्रंथों पर लोगों के नाम,
अक्षर अक्षर तो कलम की लिखाई है |

गगन चुम्बी अटारियों पर है सब की नज़र,
नींव के पत्थर की सदा किसको सुहाई है |

सज संवर के इठलाती तो हैं इमारतें ,
अनगढ़ पत्थरों की पीर नींव में समाई है |

वो दिल तो कोइ दिल ही नहीं जिसमें,
भावों  की  नहीं बज़ती  शहनाई है |

इस सूरतो-रंग का क्या फ़ायदा 'श्याम,
जो मन में नहीं पीर ज़माने की समाई है ||

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह! बहुत खूब!
बिना मतले की ग़जल लिखना हर एक के बस की बात नहीं हैं!

सलीम ख़ान said...

गगन चुम्बी अटारियों पर है सब की नज़र,
नींव के पत्थर की सदा किसको सुहाई है |

शालिनी कौशिक said...

वो दिल तो कोइ दिल ही नहीं जिसमें,
भावों की नहीं बज़ती शहनाई है |

aapki prastuti yad dila gayee-
''jo bhara nahi hai bhavon se
bahti jisme rasdhar nahi,
vah hriday nahi hai patthar hai
jisme swadesh ka pyar nahi.''
bahut sundar bhav bhar diye hain yahan aapne .

नीरज गोस्वामी said...

वो दिल तो कोइ दिल ही नहीं जिसमें,
भावों की नहीं बज़ती शहनाई है

बेहतरीन रचना...

नीरज

शिखा कौशिक said...

गगन चुम्बी अटारियों पर है सब की नज़र,
नींव के पत्थर की सदा किसको सुहाई है |
sateek prastuti .badhai Shyam ji

Dr. shyam gupta said...

---सही पहचाना शास्त्रीजी...बधाई...मैंने इसे फिसलती गज़ल के रूप में पेश किया है...मैं फिसलती गज़ल कहता हूँ .......मतला पेश है....

दुनिया ने रीति ये कैसी बनाई है |
अक्सर ज़माने को यह रास आई है|......

sushma 'आहुति' said...

bhut hi khubsurat...

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद सलीम जी, शिखा व शालिनी, नीरज जी व सुषमा जी....


मतला बगैर हो ग़ज़ल,हो रदीफ़ या नहीं |
यह तो ग़ज़ल नहीं ,ये कोई वाकया नहीं |