मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, June 20, 2011

दुनिया के दानिश्वर



कुछ समझता नहीं सियासत को
दुनियादारी को जानता ही नहीं
कोई झूठा क़सीदा लिखने को 
   -असद रज़ा

शब्दार्थ
क़सीदा-शायरी की एक विधा जिसमें तारीफ़ में शेर कहे जाते हैं।

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया कसी सजाया गया है आय मुशायरे में!

शालिनी कौशिक said...

par ham to kaseeda padh sakte hai aapki shayri ke liye-
वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

DR. ANWER JAMAL said...

@ मोहतरम शास्त्री जी !
@ मोहतरमा शालिनी जी !!
आपका शुक्रिया !!!