मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, June 24, 2011

बहारों के आस-पास

यूँ गुल खिले हैं बाग़ में खारों के आस-पास,
जैसे की गर्दिशें हों सितारों के आस-पास.
रौनक चमन में आ गयी लेकिन न भूलना, 
शायद खिज़ा छुपी हो बहारों के आस-पास.

शायर-हरीश चन्द्र''नाज़ ''
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

14 comments:

Kunwar Kusumesh said...

बढ़िया है.

वन्दना said...

बहुत खूब्।

prerna argal said...

bahut behatrin.badhaai.

Sawai Singh Rajpurohit said...

सुन्दर चना

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (25.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

शिखा कौशिक said...

Hareesh ji ka sher v aapka prastutikaran dono hi sarahniy hain .aabhar

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुत की है!

sushma 'आहुति' said...

bhut hi sunder...

अजय कुमार said...

बढ़िया है

शालिनी कौशिक said...

aap sabhi ka hardik dhanyawad.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

लाजवाब...

सलीम ख़ान said...

रौनक चमन में आ गयी लेकिन न भूलना,
शायद खिज़ा छुपी हो बहारों के आस-पास.

सलीम ख़ान said...

sahi kaha aapne...

DR. ANWER JAMAL said...

दमदार प्रस्तुति वाली शानदार रचना ।