मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, June 22, 2011

मुहब्बत के सिवा इन मसलों का हल नहीं कोई

इधर भी धूप दहशत की, उधर भी धूप दहशत की
मुरव्वत का असद लेकिन कहीं बादल नहीं कोई
यहाँ मंदिर पे ख़ूँरेज़ी, वहाँ मसलक पे नफ़रत है 
मुहब्बत के सिवा इन मसलों का हल नहीं कोई

-Asad Raza

मसलक = पंथ , ख़ूँरेज़ी = ख़ून बहाना

10 comments:

prerna argal said...

bahut khoob.chaar lino main bahut gahari baat ,aur gaharaa sandesh deti hui saarthak najm.badhai aapko.

Kunwar Kusumesh said...

सही कहा.मुहब्बत के सिवा कोई हल नहीं.

वन्दना said...

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/

शालिनी कौशिक said...

bahut sahi kaha asad ji,ek ek shabd aaj kee paristhtiyon ko bakhoobi byan kar raha hai.

Navin C. Chaturvedi said...

ख़ूबसूरत पंक्तियाँ| वाक़ई, मुहब्बत के सिवा कोई हल हो भी नहीं सकता|

क्षमा प्रार्थना के साथ कहने की ज़ुर्रत कर रहा हूँ - शायद तीसरी और चौथी पंक्ति में कुछ टाइपिंग होने से रह गया लगता है|

यदि ऐसे ही लिखा हुआ सही हो, तो कृपया नज़रअंदाज़ कर दें| बहरहाल इस ख़ूबसूरत पेशकश के लिए एक बार फिर से दिली मुबारक़बाद|

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय नवीन जी ! तीसरी लाइन में ‘है‘ शब्द टाइप होने से रह गया था,
शुक्रिया !

Anjana (Gudia) said...

Bahut hi khoobsurati se sachchai bayan ki gayi hai... :-)

शिखा कौशिक said...

bilkul sahi kaha hai aapne Asad ji .aabhar .

डा. श्याम गुप्त said...

-----चौथी पंक्ति में भी एक शब्द की कमी है ...

Navin C. Chaturvedi said...

एक शब्द नहीं सिर्फ़ एक मात्रा के बराबर की कमी, वो भी टाइपिंग मिस्टेक के कारण दिख रही है| शायर ने यहाँ 'मसअलों' कहा लगता है| आप कन्फर्म कर के चौथे मिसरे में 'मसलों' की जगह 'मसअलों' टाइप कीजिएगा| बहुत ही खूबसूरत क़ता है ये| इसलिए दोबारा लिखने के लिए आना पड़ा|