मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, June 19, 2011

मेरे वालिद

मेरे वालिद

ग़मों को ठोकरें मिटटी में मिला ही देती ,

मेरे वालिद ने आगे बढ़ के मुझे थाम लिया .


मुझे वजूद मिला एक नयी पहचान मिली ,

मेरे वालिद ने मुझे जबसे अपना नाम दिया .


मेरी नादानियों पर सख्त हो डांटा मुझको;

मेरे वालिद ने हरेक फ़र्ज़ को अंजाम दिया .


अपनी मजबूरियों को दिल में छुपाकर रखा ;

मेरे वालिद ने रोज़ ऐसा इम्तिहान दिया .


खुदा का शुक्र है जो मुझपे की रहमत ऐसी ;

मेरे वालिद के दिल में मेरे लिए प्यार दिया .

शिखा कौशिक

http://shikhakaushik666.blogspot.com


6 comments:

शालिनी कौशिक said...

मुझे वजूद मिला एक नयी पहचान मिली ,
मेरे वालिद ने मुझे जबसे अपना नाम दिया
वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

prerna argal said...

खुदा का शुक्र है जो मुझपे की रहमत ऐसी ;
मेरे वालिद के दिल में मेरे लिए प्यार दिया bahut khoob.father"s day per aapko bahut bahut shubkaamnayen.bahut achcha upahar aapne apne walid ko aaj ke din apni rachanaa ke maadhyam se diya.badhaai.

डा. श्याम गुप्त said...

सुन्दर व सार्थक रचना....बधाई

DR. ANWER JAMAL said...

आपने अच्छे मौके पर अच्छी बात कही और उर्दू अल्फ़ाज़ का सही इस्तेमाल करके इसके हुस्न को मज़ीद बढ़ा दिया है ।

शिखा कौशिक said...

guru ji sab aap ki shagirdi ka kamal hai .shukriya.

Navin C. Chaturvedi said...

अपनी मजबूरियों को दिल में छुपाकर रखा ;
मेरे वालिद ने रोज़ ऐसा इम्तिहान दिया .

आपके पिता जी के लिए आप के दिल में जो श्रद्धा है, उसे नमन